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Sanatan Dharma

सनातन धर्म — Hindu Scripture Knowledge Base

Brahma Khanda (Volume 1 source) - Chapter 6 - Verse 53

Brahma Vaivarta Purana Vol 1 (Internet Archive OCR; DLI / Sanskrit Sansthan) · 6 · Verse 53

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Sanskrit Original

धनंनेसूयको पुप्कर में उनके गुणगण कह कर सुनाये थे । श्रकृप्णगृरएकोत्तनम्‌ | | २८५ २८६ |] [ ब्रह्मववत्तं पुराणम्‌ रहा करते) ममी जिसकेभयसे दमं प्नौर ग्रधरमं के दधिपय सें नियमोंके करने वाला हु ॥ २४८-२५ । वेक्षुनिमीलने तस्य लयं प्राङतिक विदुः । श्रोकृष्ठगृराकीत्त नम्‌ |] [ १८७ स्थित रहते हैँ 1४१1 उसकी बाहु मे कुष्ण कः भ्रंश देवों ऊा श्रधीश् गरोक है । हे सुव्रते | पद्याका श्रश पद्मामेश्रौर राधा मं शिथित है [४५२ मैने जो भी श्रपने पिताक मुखसेलास्वरकेश्वनुमारसुनाहै, वमाह तुम्रो बतादियादै) चारो वेर्दोने चार प्रकार कौ मुवितयां बताई है । ४३ ॥ उन भवबमें प्रधान हटि की भक्ति डहैजो मुवित्तिसे भीवड़ीद्ै | उनमें एक इरि के सातरोग्य वैः प्रदाने करने वाली दै श्रौर दूषरीः सारुप्य को देने काची &ै । एक सामीप्य के प्रदान करने वालीहै श्रौर दीप्र निवार पद को देने वाली होन रै-एेमा स्यति कती हैँ । शक्त लोग इत मुक्तियो को नहीं चाहते ह जिनमे हरि की सेवा श्रादि कंठ भी नहीं है 1४४} ५५ ॥ सिष्दित्व श्रमरतत्व श्रीर ब्रह्मत्व ॒श्रव-हेला से जन्म, मृष्यु, जरा, व्याधि, भयर, शोक प्रादि गृतद्ा छण्डन कःते वाले हैँ 11 *६ ॥ दिव्य रूपका धारणा करने वाला निवा मोक्ष प्रदान करने वाला है । यहु मुकत्तितो हरि की सेवा से रहित होती २८० |] । ब्रह्मवेवत्त पुराणम्‌ विघ्नघ्न शुभदं चोक्तं .गच्छवत्सेयथायुखम्‌ । इत्युवतवासूय्येपुत्रश्चजी व यत्वाचतत्पतिम्‌ । ५० ॥ तस्यं शुभारिषं दच्वा गमन कत्तु मुद्यतः ॥ हषर यमञ्चगच्छन्तं सावित्रीतं प्रराम्यच ॥ ५१\ रुरोद चरणेधृत्वा सदविच्छेदोऽतिदु खदः । सावित्रीरोदनं दृष्टा यम एव कुपानिधिः ॥ तामित्युवाच सन्पुष्टो राद चापि नारद । ,५२ । लक्षवर्षं सुखं मुर्वत्वा पुण्यक्षेत्रे च भारते । ग्रन्ते यास्यसि गालोक श्रोकृष्णभवनं शुभे ॥ ५३ ॥

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