Brahma Khanda (Volume 1 source) - Chapter 3 - Verse 291
Brahma Vaivarta Purana Vol 1 (Internet Archive OCR; DLI / Sanskrit Sansthan) · 3 · Verse 291
Sanskrit Original
न समर्था ग्रोौ रुष्टे रक्षणे स्वंदेवताः । १४ ॥ श्री गुरुदेव काध्ान करक श्रपने शवेत-निमंल हृदय रूगी पद्म पर रिवोक्ताह्िकाचारवणंनम् | [ £ ९२ | [ ब्रह्मवेवत्त पुराणम् ग्रामाद्यम्यन्तरञ्चेव नरां गहसमीपक्रम् । रद्ध. सेतुः शरवमं श्मशानवद्धिसन्चिधिम् । २१ । जिस भाग्यश्चाली सधिक्र के गुरुदेव परम प्रसन्न एवं िष्यसे पूणं श्री गुरुदेव की श्रना प्रथम न करके देवका पूजन भ्रभसे किया करता, वहू एक शतब्रह्म हत्या के समान महापापका भागी अ्रवक्यहीहो जाता इसमे तनिके भी संशय नहींहै ॥ ६१६ ॥ सामवेद में भगवान् हरिने स्वय ही यह कहा था, इसलिये श्रपने उपास्य एवं भ्रभीष्ट देव से भी भ्रधिक गुरुदेव ही पुज्यतम होते हँ ॥ १७ ॥ हं मुने ! श्रततएव इष्ट श्रीगुरु चरणका स्वयं ध्यान करक श्रौर् साधना करने वले व्यक्ति को उनका स्तवन करके फिर वेद मे बताया हुभ्रा स्थल प्रप्त करके सानन्द मलमूत्रादि का उतसगं करना घाहिये । १८ ॥ । भ्रब मल-मृत्र कै -उप्सगं करने के विपय मे पूरा विषररण दियानजातादहै कि किस स्थान का इसके करने परे करना चाहियि--जलके समीप का स्थल-रन्धु (छिद्र, से युक्त स्थान प्राणियों की सन्निधि वाला स्थल देवालय के समौपका स्थानःवृक्ष का मल प्रदेश श्रौर मागं का स्थान मलमूत्र केत्याग करने मेँ त्यागकर देना चाहिये ॥ १९ । ) हृल से उत्कषंणा जिस गायो के रह्ने.बेखने का स्थल) कौ नदी श्रौर कन्दरा के मध्य भाग को-- पष्पों वले उद्यान को श्रीर पद्किल ( कोच या दलदल वाले} स्थान को मलमूत्रोत्सजेनके काममें त्याग करदेना चाद्ये (२० ॥ | प्राम श्रादि जना वासो के भीत्तरी भाग को-मनुष्यों के निवासकरने वालों ग्रहं के समीय क स्थल को-शक्कु.को-सेतुको-शरोके वनको-मशान भूमि के स्थान कोश्रौर् श्रगिति के समीप में रहने वाले स्थानकोभी मलादि के त्याग करने में भ्रवद्य ही वजित कर देना चाह्यि ॥ २९१ ॥
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