Brahma Khanda (Volume 1 source) - Chapter 1 - Verse 21
Brahma Vaivarta Purana Vol 1 (Internet Archive OCR; DLI / Sanskrit Sansthan) · 1 · Verse 21
Sanskrit Original
सा तुष्टाव पुरः स्थित्वा पर ब्रह्य सनातनम् । * 'पुटाञ्जलिपरा साध्वी भक्तिनिम्नात्मकम्धरा । ३ ॥ नमामि सवंवीजं त्वां ब्रह्मज्योति. सनातनम् । परातूपरतरं शयामं निविकरारनि रक्षनम् ॥ उस पुरुष "के वाम पादवं से जिसका नाम कामे था एक परम श्रेष्ठ श्रत्यन्त ललित भ्रौर सवके मनको मोहित करने वाली कामिनी रति समुन्पन्न हई थौ । सभीने उसे मन्द मुस्कान से युक्त सतीकोदेस्मणाथा । ईइस्तीलियै लों हश्वर की दच्छवासे काम वासना से समन्वित ष्टो भेये । ॥ १२ ॥ उस ६० ] [ ब्रह्मवेवत्ते पुराणम् समय उक्त परम सुन्दरी रति को देख कर ब्रह्मा के वीयं का पातहोगयाभा । वहां पर महा योगी जो स्थित थे उन्होने उसको बस्व से भ्राच्छादित कर दिया धा । १२ ॥ सा स्वाहा ब्धिपत्नीं तां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ १९ ॥ जलेरास्य वामपार्शवात् कन्या चेका बभूव सा । वरुणानीति विख्याता वरुणस्य प्रिया सती । २० ॥ बभव पवनः श्रीमान् विभोनि-ख(सवायुना । स प्रमाराश्च सवषां तिःशवासस्तत्कलोद्धवः ॥ २१ ॥
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