bhavisya-purana-bhp-4-uttaraparvan-ch-103
Shlokas (2)
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Bhavishya Purana (Gita Press Gorakhpur EPUB derivative from Internet Archive) · Chapter 103 · Verse 37
प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नैमिष, शालग्राम, कुशावत, मूलस्थान, सकुन्तल, गोकर्ण, अर्बुद, अमरकण्टक आदि किसी पवित्र तीर्थमें अथवा अपने घरमे ही स्नान करे । फिर देवता, ऋषि, पितर ओर अतिथिका पूजन कर हवन करे । सायंकालके समय घृत ओर दुग्धसे पूर्णं छः पात्रोमें सुवर्ण, ्चँदी, रल, नवनीत, अन्नकण तथा पिष्टसे छः कृत्तिकाओंकी मूर्तिं बनाकर स्थापित करे । फिर उन्हें रक्तसूत्रसे अवेष्टित कर सिंदूर, कुकुम, चन्दन, चमेलीके पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उनका पूजन कर कृत्तिकाओंकी मूर्तियोको ब्राह्मणको दान कर दे । दान करते समय यह मन्त्र पठेॐ सपर्षिदारा ह्यनलस्य वल्लभा या ब्रह्मणा रक्षितयेति युक्ताः । कुमारस्य यथार्थमातरो ममापि सुप्रीततरा भवन्तु ॥
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Uttaraparvan - Chapter 103 - Verse 39
Bhavishya Purana (Gita Press Gorakhpur EPUB derivative from Internet Archive) · Chapter 103 · Verse 39
ब्राह्मण भी मूर्तिं ग्रहण करते समय इस प्रकार मन्त्रोच्चारण करेधर्मदाः कामदाः सन्तु इमा नक्षत्रमातरः । कृत्तिका दुर्गसंसारात्
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