Uttaraparvan - Chapter 204 - Verse 10
Bhavishya Purana (Gita Press Gorakhpur EPUB derivative from Internet Archive) · 204 · Verse 10
bhavisya-puranabhp-4-uttaraparvanchapter-204source-backed-epub-extract
Sanskrit Original
मन्त्रौका उच्चारण करते हुए बीचका प्रधान पर्वत गुरुको ओर चारों विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे । वे मन्त्र इस प्रकार है-सौभाग्यामृतसारोऽयं परमः शर्करायुतः ॥ यस्मादानन्दकारी त्वं भव शैलेन्द्र सर्वदा । अमृतं पिबतां ये तु निष्येतुर्भुवि शीकराः ॥ देवानां तत्समुत्थोऽसि पाहि नः शर्कराचल । मनोभवधनुर्मध्यादुद्धूता शर्करा यतः ॥ तन्मयोऽसि महाशैल पाहि संसारसागरात्
Original Source: View source ↗
No translation available yet.